JEE MAINS Exam के चार दिनों में हमने बाकी इंस्टीट्यूट्स की तरह Spectrum के Vision को लोगों तक
पहुंचाने की कोशिश की । इस कवायद में हमने देखे कुछ मां- बाप जो देहरादून के
एक्जाम सेंटर पर अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य की आस लगाए बैठे तो कुछ खड़े थे ।
यूं तो सर्दियों की धूप सभी
को भाती है लेकिन इंतज़ार की घड़ियों में ये चटक धूप मन को बहुत बेचैन करती हैं ।
खासकर तब जब आप मां बाप की भूमिका में हो । एक मां पिछले कई घंटों से भारी बस्ता
लिए उस एक सेंटर की दीवार पर पीठ टिकाए बैठी थी । नींद के झोंको से जूझती हुई वो
अचानक अपना बैग पकड़ लेती । उसे देखकर हमें अपनी बात उस तक पहुंचाने की हिम्मत
नहीं हुई इसलिए उसके पास जाकर उसे अपना पैम्पलेट थमाने की बजाय हमने उससे बात करना
बहतर समझा । चेहरे की थकान और भारी बैग साफ बता रहा था कि वो कहीं दूर पहाड़ों से
सफर करते हुए यहां पहुंची है और उसकी कच्ची नींद इस बात का सबूत थी कि घर की चक्की
में पिसने के साथ वो अपने बच्चे के भविष्य संग कई रातें जागी होगी । हम उस महिला
के पास गए और उसे पानी की बॉटल थमाई । उसने हल्की सी मुस्कान और झेंप के साथ पूरा
पानी एक घूंट में पी लिया । ये देखकर मन बड़ा कच्चा सा हुआ । हमने आगे बातचीत की
तो पता चला कि वो टिहरी की रहने वाली हैं और पिछली रात से सेंटर पर ही बैठी हैं ।
उन्होंने बताया कि उनके रिश्तेदार यहां रहते हैं जहां वो बेटे की परीक्षा के बाद
जाएंगी । जब हमने पूछा कि रात ही वो वहां क्यों नहीं चली गई तो उनका जवाब था
रिश्तेदारों का घर दूर है और वहां से ऑटो का किराया भी बहुत है । हमारे हाथ में Pamphlets थे जिसे देखते ही उसने कहा कि इतने
पैसे नहीं है कि बच्चे को देहरादून ठहरा कर कोचिंग करा सके । ये सब सुन कच्चा मन और दुखा । ख्याल आया कि क्यों हमारे देश में सपने देखना
और उसे पूरा करना इतना तकलीफदेह है ? शायद इसलिए इस देश में कई लोग सपने देखने की हिम्मत भी नहीं
कर पाते । जो सपने देखते भी हैं वो कोचिंग के बाज़ार की गिरफ्त में आ जाते हैं । खैर हमने उसे अपनी तरफ से आश्वासन
दिया और मन में ढ़ेर सारी उथल-पुथल को लेकर आगे बढ़े । जहां जहां नज़र गई वहां –
वहां हमें ऐसे मां – बाप दिखे । कुछ दूर पहाड़ों से तो कुछ खुद देहरादून से । एक
पिता से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने मुंह फेर लिया और धीरे से बोले कि सब
यही कहते हैं कि हमारा इंस्टीट्यूट सबसे अच्छा है । इस पर हमने कहा “नहीं सर हम सबसे अच्छे नहीं है
क्योंकि सबसे अच्छे की परिभाषा को अभी तक कोई छू भी नहीं पाया है । हम तो बस कोशिश
कर रहें हैं कि बच्चा या उसके मां बाप कस्टमर ना बनकर साथी बने जिनके साथ मिलकर हम
शिक्षा और अच्छे होने की परिभाषा बना पाएं ।“
बतौर एक कोचिंग संस्थान हम
ये कहने से नहीं झिझकते की हर बच्चा आईआईटी नहीं जा सकता, लेकिन ये ज़रूर कहते हैं
कि ज़िंदगी की मंज़िल सिर्फ आईआईटी नहीं । इसी मंज़िल को ढ़ंढते हुए एक बार Spectrum ज़रूर आईए । आपकी मंजिल चाहे IIT हो, BITS हो या कोई और उच्च संस्थान हम वादा करने में कभी नहीं झिझकेंगे की आप भटकेंगे
नहीं बल्कि वहां पहुंचेंगे जहां सफलता आपके इंतज़ार में है ।
वैसे पूरी उम्मीद और कोशिश
करेंगे कि स्पैक्ट्रम की सफलता के बढ़ते कदम बाकियों की तरह रंग –
बिरंगे पर्चे बांट पाए या ना बांट पाए लेकिन पानी की कुछ बूंदे उन इंतज़ार कर रहे
मां बाप तक ज़रूर पहुंचेंगी । बस आप लोगों का साथ और विश्वास बना रहे ।
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